डॉलर के मुकाबले रुपये में उतार-चढ़ाव

                    

डालर रुपया उतार चढ़ाव

ताज़ा स्थिति 

आज 6 अप्रैल 2026 को 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत 92.855 भारतीय रुपये है। आज का अनुमानित उच्चतम-निम्नतम दायरा ₹92.76 से ₹93.74 के बीच है।   USD/INR दर 6 अप्रैल को 92.99 तक पहुँची, जो पिछले सत्र से 0.25% की वृद्धि है। पिछले एक महीने में रुपया 1.61% कमज़ोर हुआ है और पिछले 12 महीनों में 8.13% की गिरावट दर्ज की गई है।  

यह आँकड़े सतह पर सामान्य लग सकते हैं, लेकिन इनके पीछे एक बेहद जटिल और चिंताजनक तस्वीर छिपी है। भारतीय रुपया इस वक्त जिन दबावों का सामना कर रहा है, वे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय — दोनों मोर्चों पर हैं।

2026 में रुपये की यात्रा: ऊँचाई से गहराई तक

2026 में USD/INR की अब तक की सबसे अच्छी दर 7 जनवरी को ₹89.86 थी। लेकिन सबसे बुरी हालत 27 मार्च को आई, जब डॉलर ₹94.86 तक पहुँच गया। साल 2026 का औसत विनिमय दर अब तक ₹91.60 रही है।  

वित्त वर्ष 2025-26 रुपये के लिए बेहद कठिन साबित हुआ — पूरे साल में रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 10% कमज़ोर हुआ।  यह गिरावट अचानक नहीं आई; इसके कई स्तर हैं।

रुपया ईरान युद्ध शुरू होने से पहले ही कमज़ोर हो रहा था। केवल दो महीनों में यह 1 जनवरी 2026 के ₹89.94 से गिरकर 27 फरवरी 2026 को ₹91.01 तक पहुँच गया था।  

सबसे बड़ा कारण: ईरान युद्ध का आघात

बाज़ार में उथल-पुथल का मुख्य कारण मध्य-पूर्व में फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुआ सैन्य संघर्ष है, जिसमें अमेरिका, इज़राइल और ईरान शामिल हैं। इस संघर्ष ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को प्रभावी रूप से बंद कर दिया, जो दुनिया की लगभग एक-पाँचवीं तेल और गैस आपूर्ति का केंद्र है।  

ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से तेल की कीमतें $60 से बढ़कर $120 प्रति बैरल तक पहुँच गईं — जो चार वर्षों में सबसे अधिक है।  

भारत के लिए यह विशेष रूप से दर्दनाक है, क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85% से अधिक आयात करता है। Brent Crude के हर $10 प्रति बैरल की वृद्धि से भारत के चालू खाते के घाटे पर लगभग $12-15 अरब का सालाना बोझ पड़ता है।  

रुपये की इस गिरावट की एक तात्कालिक वजह स्पष्ट है — भारत तेल और गैस का एक बड़ा आयातक है, जिसका अधिकांश हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से होकर आता है। इस बंदरगाह के बंद होने से न केवल इन वस्तुओं की उपलब्धता घटी, बल्कि भारत के भुगतान संतुलन पर भी भारी दबाव पड़ा।  

ऐतिहासिक निचला स्तर: मार्च 2026 की काली तारीखें

23 मार्च 2026 को रुपया एक नए ऐतिहासिक निचले स्तर ₹93.94 पर पहुँच गया, जिससे साल-दर-तारीख मूल्यह्रास 3.6% तक पहुँच गई।  

इसके बाद 30 मार्च को रुपया ऐतिहासिक रूप से ₹95.23 के निचले स्तर को छूते हुए और गिरा।  

पिछले चार हफ्तों में रुपये की रक्षा करने के प्रयासों में विदेशी मुद्रा भंडार से $40 अरब की निकासी हो चुकी है।  

RBI की भूमिका: ढाल बनाम बाढ़

भारतीय रिज़र्व बैंक इस पूरे संकट में सबसे सक्रिय खिलाड़ी रहा है। RBI ने रुपये की गिरावट को रोकने के लिए एक ही हफ्ते में अनुमानित $12 अरब का इस्तेमाल किया। केंद्रीय बैंक ने स्पॉट, फॉरवर्ड और नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDF) बाज़ारों में डॉलर बेचे।  

RBI ने सट्टेबाज़ी पर लगाम लगाने के लिए कई उपाय किए, जिनमें फॉरवर्ड लेनदेन पर प्रतिबंध और बैंकों की विदेशी मुद्रा स्थिति पर कड़ी सीमाएँ शामिल हैं, जिनमें नेट ओपन पोजीशन पर $100 मिलियन की अधिकतम सीमा भी शामिल है।  

RBI ने रुपये को स्थिर करने के लिए ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से अनुमानित $20 अरब तक की तैनाती की, लेकिन इसके बाद भी रुपये की तेज़ गिरावट नहीं रुकी।  

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा की टीम विदेशी मुद्रा स्थितियों को सीमित करने के लिए जुटी है। इसके साथ ही RBI भारत के सबसे बड़े बैंकों को केंद्रीय बैंक पर निर्भर रहने की बजाय खुद डॉलर उपलब्ध कराने के लिए प्रेरित कर रहा है।  

FPI का पलायन: पूँजी का बड़ा संकट

FPI (विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों) ने मार्च महीने के दौरान इक्विटी और ऋण में $13 अरब से अधिक की बिकवाली की, जिससे डॉलर की माँग लगातार बनी रही।  

विदेशी निवेशकों ने कैलेंडर वर्ष 2026 में अब तक भारतीय इक्विटी से ₹1.07 लाख करोड़ से अधिक की निकासी की है। भारत का भुगतान संतुलन लगातार दो वित्त वर्षों के लिए घाटे में रहने का अनुमान है — जो भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में पहली बार हो सकता है।  

विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ता बोझ

ईरान संघर्ष के शुरू होने पर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार $728 अरब थे, जिनमें से विदेशी मुद्रा संपत्तियाँ $573 अरब थीं। लेकिन केवल तीन हफ्तों में ये घटकर $698 अरब रह गए और विदेशी मुद्रा संपत्तियाँ $559 अरब पर आ गईं।  

व्यापार-संबंधी अनिश्चितताओं के कारण बड़े पैमाने पर पूँजी प्रवाह में बाधा आई। 2025 में FPI ने भारतीय शेयरों से लगभग $19 अरब की बिकवाली की।  

आम आदमी पर असर

रुपये की इस गिरावट का असर सिर्फ बाज़ारों तक सीमित नहीं है। कमज़ोर रुपया आयातित वस्तुओं — पेट्रोल, डीज़ल, खाद्य तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और दवाइयों — को महँगा बना देता है, जिससे खुदरा महँगाई बढ़ती है। विदेश में पढ़ाई और विदेश यात्रा भी रुपये के नज़रिए से महँगी हो जाती है।  

सरकारी तेल कंपनियाँ कच्चे तेल की ऊँची कीमत और कमज़ोर रुपये — दोनों की दोहरी मार झेल रही हैं। उन्हें अब तेल आयात के लिए ज़्यादा डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर और दबाव बढ़ रहा है।  

आगे क्या? — विशेषज्ञों की राय

Goldman Sachs ने पूर्वानुमान लगाया है कि ईरान संघर्ष के प्रभाव से भारतीय रुपया अगले एक साल में $95 प्रति डॉलर तक गिर सकता है।  

Wells Fargo और Van Eck Associates के विश्लेषकों का मानना है कि अगर ईरान युद्ध लंबा खिंचा तो रुपया $100 के स्तर तक कमज़ोर हो सकता है। Equiti Group के शोधकर्ता Ahmed Aizan के अनुसार, "$100 प्रति डॉलर अब कोई असंभव जोखिम नहीं रहा — यह मौजूदा परिस्थितियों में एक विश्वसनीय दबाव परिदृश्य है।"  

तीन मुख्य परिदृश्य सामने आ रहे हैं — पहला: अगर ईरान संघर्ष जल्दी समाप्त होता है, Brent Crude $90 से नीचे आता है और FII निवेश लौटता है, तो रुपया Q3 2026 तक ₹88-90 तक वापस सुधर सकता है। दूसरा (मूल परिदृश्य): अगर संघर्ष जारी रहा लेकिन और नहीं बढ़ा, तो रुपया ₹92-94 के बीच स्थिर हो सकता है। तीसरा (सबसे बुरा): अगर स्थिति और बिगड़ी, तो Goldman Sachs के अनुसार ₹95-96 भी संभव है।  

संकट में अवसर भी

कुछ स्तर की मुद्रा अवमूल्यन इस कठिन आर्थिक माहौल में भारतीय निर्यातकों की मदद कर सकती है। एक बार जब युद्ध की स्थिति में स्पष्टता आएगी, तो इससे न केवल निर्यातकों को बाज़ार में वापसी में मदद मिलेगी बल्कि विदेशी निवेशकों को भी भारतीय संपत्तियाँ सस्ती मिलेंगी, जिससे भुगतान संतुलन में सुधार होगा।  

रुपया फिलहाल RBI की सख्त उपायों की बदौलत ₹92.9 के आसपास स्थिर है, जो सट्टेबाज़ी पर अंकुश लगाने में मददगार रहे हैं — लेकिन इन उपायों ने हेजिंग की स्थितियाँ भी कठिन बना दी हैं।  

संक्षेप में कहें तो रुपये की वर्तमान कमज़ोरी न तो कोई अचानक घटना है, न ही पूरी तरह भारत के नियंत्रण में। यह वैश्विक भूराजनीति, तेल बाज़ार की अस्थिरता, विदेशी पूँजी प्रवाह और अमेरिकी फेड की नीतियों का मिला-जुला परिणाम है। RBI और सरकार की सतर्कता और सटीक नीतिगत कदम ही इस तूफ़ान में रुपये की रक्षा कर सकते हैं।