भारत-बांग्लादेश संबंध: तनाव से सामंजस्य की ओर — एक नया अध्याय
अप्रैल 2026 में हुई उच्चस्तरीय वार्ता और बदलते द्विपक्षीय समीकरण
भारत और बांग्लादेश के संबंधों की कहानी पिछले दो वर्षों में कई उतार-चढ़ावों से भरी रही है। अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना की सत्ता से विदाई और उनका भारत में शरण लेना, इस रिश्ते में खटास का सबसे बड़ा कारण बना। 2025 का पूरा साल भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक दृष्टि से सबसे चुनौतीपूर्ण वर्षों में गिना गया। राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक दबाव और अल्पसंख्यकों के खिलाफ उत्पीड़न के आरोपों के बीच इस दौरान भारत-बांग्लादेश संबंधों में लगातार गिरावट दर्ज की गई।
मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान भारत विरोधी बयानबाजी खूब बढ़ी, और दोनों देशों के रिश्ते अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच गए। इस माहौल में यह सवाल उठने लगा था कि क्या दशकों पुरानी यह साझेदारी फिर से पटरी पर आ पाएगी?
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन और नई उम्मीद
13 फरवरी 2026 को संपन्न हुए आम चुनावों में तारिक रहमान की पार्टी, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने दो-तिहाई बहुमत के साथ प्रचंड जीत हासिल की। इस ऐतिहासिक जीत के कुछ ही घंटों बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान से फोन पर बात की और उन्हें बधाई दी। PM मोदी ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश का समर्थन करना जारी रखेगा।
फरवरी 2026 में बनी नई सरकार के बाद से दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार के संकेत लगातार मिलने लगे। बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सत्ता संभालने के बाद यह बदलाव और स्पष्ट हुआ। नई सरकार के साथ भारत के लिए एक नई शुरुआत की संभावना खुल गई थी।
ऐतिहासिक "सद्भावना दौरा" — अप्रैल 2026
इसी कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाया गया अप्रैल 2026 की शुरुआत में। भारत के साथ संबंधों को फिर से बेहतर बनाने की पहली कोशिश में, बांग्लादेश की BNP सरकार के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान नई दिल्ली का दौरा करने पहुँचे। ढाका ने इस घटनाक्रम को नई दिल्ली के साथ द्विपक्षीय संबंधों को फिर से मज़बूत करने के लिए एक "सद्भावना दौरा" बताया।
खलीलुर रहमान का यह तीन दिवसीय दौरा (7 से 9 अप्रैल 2026) आने वाले समय में प्रधानमंत्री तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा के लिए एजेंडा तय करने वाला माना जा रहा है। यह इसलिए भी खास था क्योंकि नई सरकार बनने के बाद तारिक सरकार के किसी मंत्री का यह पहला आधिकारिक भारत दौरा था।
जयशंकर-खलीलुर रहमान वार्ता: क्या हुई चर्चा?
8 अप्रैल को नई दिल्ली में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच बेहद महत्वपूर्ण बैठक हुई। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने बांग्लादेशी समकक्ष खलीलुर रहमान को ढाका में नई सरकार के साथ 'रचनात्मक' रूप से जुड़ने और द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने की भारत की इच्छा से अवगत कराया। जयशंकर और रहमान ने अपनी बैठक में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान के तनाव को पीछे छोड़ते हुए सहयोग का एक नया मार्ग प्रशस्त करने पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।
इस बैठक में वीजा सुविधाओं, ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग और प्रत्यर्पण जैसे गंभीर व रणनीतिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। इस वार्ता में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर भी शामिल रहे।
बांग्लादेश की विदेश नीति की नई दिशा को स्पष्ट करते हुए रहमान ने बैठक में कहा कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी सरकार "बांग्लादेश प्रथम" के सिद्धांत और आपसी विश्वास, सम्मान एवं पारस्परिक लाभ के आधार पर अपनी विदेश नीति आगे बढ़ाएगी।
प्रमुख मुद्दे जो चर्चा में रहे
वीजा सेवाएं और लोगों का जुड़ाव: बांग्लादेश ने भारत से वीजा प्रक्रिया को पूरी तरह बहाल करने की मांग की ताकि शिक्षा, इलाज, पर्यटन और व्यापार के लिए लोगों की आवाजाही आसान हो सके। यह मुद्दा लाखों बांग्लादेशी नागरिकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो चिकित्सा और शिक्षा के लिए भारत पर निर्भर रहते हैं।
ऊर्जा सहयोग: ऊर्जा के मोर्चे पर बांग्लादेश ने हाल ही में डीजल की आपूर्ति के लिए भारत के पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी का आभार व्यक्त किया। मंत्री खलीलुर रहमान ने भारत से डीजल और खाद की आपूर्ति बढ़ाने का विशेष अनुरोध किया, जिस पर मंत्री पुरी ने सकारात्मक और शीघ्र विचार करने का आश्वासन दिया।
सुरक्षा सहयोग और NSA से मुलाकात: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने मंगलवार शाम रहमान के लिए रात्रिभोज की मेजबानी की थी। रहमान ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से भी मुलाकात की, जहां सुरक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग को लेकर गहन मंथन हुआ।
कनेक्टिविटी और पूर्वोत्तर: भारत खासतौर पर BBIN क्षेत्र में विकास साझेदारी, उत्तर-पूर्व से जुड़े प्रोजेक्ट्स और एक्ट ईस्ट पॉलिसी को आगे बढ़ाना चाहता है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को बांग्लादेश के माध्यम से जोड़ने की रणनीतिक योजना न केवल आर्थिक अवसर पैदा करेगी, बल्कि दोनों देशों के बीच भौगोलिक निकटता को कूटनीतिक लाभ में बदलने का अवसर भी देगी।
जल बंटवारा — सबसे संवेदनशील मुद्दा: बांग्लादेश की नई सरकार द्वारा लंबित समझौतों पर ठोस प्रगति के लिए भारत पर दबाव बनाने की कोशिश रही। जल बंटवारे का विषय सबसे अहम रहा, विशेष रूप से तीस्ता जैसी सीमा पार नदियों से संबंधित। इसके अलावा 1996 में 30 साल के लिए हुई गंगाजल बंटवारा संधि अब 2026 के अंत में समाप्त हो रही है, जिसके नवीनीकरण पर भी चर्चा होना स्वाभाविक है।
भारत की "नेबरहुड फर्स्ट" नीति और रणनीतिक संदर्भ
इस पूरे घटनाक्रम को भारत की "नेबरहुड फर्स्ट" नीति के संदर्भ में देखना जरूरी है। भारत ने बांग्लादेश में तनाव के बावजूद बीच-बीच में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के साथ संवाद की कोशिशें की थीं, हालांकि शेख हसीना के सत्ता से जाने तक इस कोशिश में सीमित सफलता ही मिली थी। अब BNP के सत्ता में आने के बाद वह निवेश रंग ला रहा है।
दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भी यह वार्ता अत्यंत महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश एक ऐसा देश है जो भारत के पूर्वी हिस्से को तीन तरफ से घेरता है। यदि ढाका बीजिंग के करीब जाता है, तो यह भारत की सामरिक स्थिति के लिए गंभीर चुनौती होगी। इसीलिए भारत ने नई सरकार के साथ रिश्ते बनाने में देरी नहीं की।
आगे की राह: क्या उम्मीद की जा सकती है?
दोनों पक्षों ने सहमति व्यक्त की है कि आपसी सहयोग को और गहरा करने के लिए विभिन्न द्विपक्षीय तंत्रों के माध्यम से जल्द ही और अधिक उच्चस्तरीय और आधिकारिक बैठकें आयोजित की जाएंगी।
खलीलुर रहमान का यह दौरा प्रधानमंत्री तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा के लिए एजेंडा तय करने वाला माना जा रहा है। यदि प्रधानमंत्री स्तर की यह मुलाकात संपन्न होती है, तो यह दोनों देशों के रिश्तों में एक नए युग की शुरुआत होगी।
इससे पहले भारत के उच्चायुक्त प्रणय वर्मा ने ढाका में प्रधानमंत्री रहमान से मुलाकात की थी और भारत की मंशा व्यक्त की कि वह बांग्लादेश की सरकार और जनता के साथ पारस्परिक हित और लाभ के आधार पर सकारात्मक, रचनात्मक और भविष्य उन्मुख दृष्टिकोण अपनाते हुए मिलकर काम करना चाहता है।
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते महज दो देशों की कूटनीति नहीं, बल्कि दो सभ्यताओं, दो संस्कृतियों और करोड़ों लोगों का साझा इतिहास और भविष्य है। 1971 के मुक्तिसंग्राम से लेकर आज तक, इस रिश्ते में कई उफान और ठहराव आए हैं।
अप्रैल 2026 की यह वार्ता उस तनाव के बाद की पहली ठोस कूटनीतिक पहल है जो अगस्त 2024 से लेकर फरवरी 2026 तक बनी रही। दोनों पक्षों ने यह संदेश दिया है कि वे पुराने तनाव को भुलाकर आगे बढ़ने को तैयार हैं। ऊर्जा, व्यापार, कनेक्टिविटी, सुरक्षा और जल बंटवारे जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की जो इच्छाशक्ति दिखी है, वह आशाजनक है।
लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब इन बातचीत का ठोस परिणाम जमीन पर दिखेगा — चाहे वह तीस्ता समझौता हो, वीजा सुविधाओं की बहाली हो, या फिर ऊर्जा सहयोग का विस्तार। "बांग्लादेश फर्स्ट" और "नेबरहुड फर्स्ट" — दोनों नीतियाँ यदि वास्तविक सहयोग में बदलती हैं, तो दक्षिण एशिया का यह सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय रिश्ता एक बार फिर मजबूत नींव पर खड़ा हो सकता है।
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